अपरा एकादशी को मोक्ष का द्वार माना गया है

नाथद्वारा ( दिव्यशंखनाद ) 22 मई | हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है।
अपरा एकादशी का व्रत रखने पर मान्यतानुसार हर कार्य में अपार सफलता मिलती है| इस एकादशी के मौके पर पूरे मनोभाव से भगवान विष्णु की पूजा संपन्न की जाए तो बिगड़े हुए काम बन जाते हैं| माना जाता है कि इस व्रत से मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान कृष्ण ने स्वयं अपरा एकादशी के व्रत के महत्व के बारे में बताया है। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार, अपरा एकादशी को मोक्ष का द्वार माना गया है। भगवान कृष्ण ने भी इस व्रत के बारे में कहा है कि जो कोई भी भक्ति और ईमानदारी से यह व्रत रखता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है। ‘अपरा’ शब्द का अर्थ है ‘असीम’। इसलिए, इस व्रत को रखने के फायदे भी असीम हैं।
अपरा एकादशी कब है, तिथि और शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, अपरा एकादशी 23 मई 2025 को मनाई जाएगी। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 22 मई की रात को 1 बजकर 12 मिनट पर बजे शुरू होगी और अगले दिन 23 मई को रात में 10 बजकर 29 मिनट पर समाप्त होगी, इसलिए उदया तिथि के नियमों के अनुसार, इस बार अपरा एकादशी 23 मई को मनाई जाएगी। अगले दिन 24 मई को व्रत का पारण किया जाएगा। उदयातिथि के नियमानुसार, जिस दिन सूर्योदय के वक्त जो तिथि होती है, उस दिन उसी तिथि का मान होता है। इसलिए अपरा एकादशी 23 मई को मनाई जाएगी।
माहात्मय :
माघ में सूर्य के मकर राशि में होने पर प्रयाग में स्नान, शिवरात्रि में काशी में रहकर व्रत, गया में पिंडदान, वृष राशि में गोदावरी में स्नान, बद्रिकाश्रम में भगवान केदार के दर्शन या सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान और दान के बराबर जो फल मिलता है, वह अपरा एकादशी के मात्र एक व्रत से मिल जाता है। अपरा एकादशी को उपवास करके भगवान वामन की पूजा से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। इसकी कथा सुनने और पढ़ने से सहस्र गोदान का फल मिलता है।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि अपरा एकादशी पुण्य प्रदाता और बड़े-बड़े पातकों का नाश करने वाली है। ब्रह्मा हत्या से दबा हुआ, गोत्र की हत्या करने वाला, गर्भस्थ शिशु को मारने वाला, परनिंदक, परस्त्रीगामी भी अपरा एकादशी का व्रत रखने से पापमुक्त होकर श्री विष्णु लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है।
कथा :
महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर इसने राजा की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। इन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना।
ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनी से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया।
इस प्रकार से जो भी अपरा एकादशी का व्रत रखता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है| पूजा के समय यह व्रत कथा जरूर सुननी चाहिए| कथा सुनने वाले को भी पुण्य की प्राप्ति होती है| आप अपने पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति के लिए भी अपरा एकादशी का व्रत कर सकते हैं|

