श्रीजी प्रभु में सांझी के कोट में द्वारका नगरी का हुआ चित्रण, प्रभु को अरोगाया महादान का भोग

नाथद्वारा ( दिव्यशंखनाद ) 22 सितम्बर | पुष्टीमार्गीय प्रधान पीठ प्रभु श्रीनाथ जी की हवेली के तिलकायत श्री गो.ति.108 श्री राकेश जी (श्री इंद्रदमन जी) महाराज श्री व उनके सुपुत्र युवाचार्य गो.चि.105 श्री विशाल जी (श्री भूपेश कुमार जी) बावा श्री के वल्लभ कुल परिवार सहित दि. 20/09/2025,शनिवार आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को श्रीजी प्रभु के दान लीला एव सांझी के कोट की सेवा में नाथद्वारा पधारने के अवसर पर श्री लाडले लाल प्रभु के बगीचे में प्रथम बार शनिवार चतुर्दशी को आरती दर्शन में जल की सांझी के मनोरथ का भव्य मनोरथ किया गया।

श्रीजी प्रभु की हवेली में प्रथम बार जल की सांझी के मनोरथ का यह भव्य आयोजन तिलकायत श्री की आज्ञा से किया गया जिसमें विविध रंगों एवं आकृतियों से निर्मित रंगों को एक विशेष विधि द्वारा जल पर उकेरा गया जो बड़ा नयनाभिराम दृश्य था। इस अलौकिक छठा में श्री लाडले लाल प्रभु को विराजित कर श्री विशाल बावा ने प्रभु की आरती उतारी एवं लाड लड़ाए ।

वहीं दि.21/09/2025,रविवार दान के अंतिम दिन अमावस्या के अवसर पर तिलकायत श्री व श्री विशाल बावा ने प्रभु को महादान का भोग अरोगाया एवं कमल चौक में दान के अंतिम दिवस अमावस्या के अवसर पर रंग बिरंगी पन्नियों से निर्मित कोट के रूप में द्वारका नगरी का चित्रण किया गया एवं सांझी की आरती उतारी गई। इस अवसर पर श्री विशाल बावा ने सांझी के पंद्रह दिनों के भाव एवं उसकी परंपरा का बड़े ही सुंदर शब्दों में अपने उद्बोधन में सांझी के भाव को व्यक्त किया, “सांझी लीला भाद्रपद पूर्णिमा से सांझी उत्सव के रूप में प्रारंभ होता है, जो पंद्रह दिन लगातार चलने के उपरांत अश्विन की अमावस्या को कोट की विशेष आरती के साथ संपन्न होता है।

सांझी ब्रज की एक लोक देवी है जिसका पूजन संध्या के समय होता है कदाचित इस कारण इसका नाम सांझी पड़ गया सांझी गौरी पार्वती का ही एक लोक प्रसिद्ध रूप है।अश्विन की प्रथम पखवाड़े में इसके पूजन की ब्रजमंडल में भारी धूम रहती है ब्रज की कन्याएं दीवाल पर गाय के गोबर से सांझी की परंपरागत निश्चित छवि का रोपण कर उसमें फूलों से रंग भरकर सजाती है। यह चित्रण पंद्रह दिन तक प्रतिदिन नए रूप में किया जाता है अंतिम दिन बड़े रूप में कोट सी रखा जाता है,पूजन पश्चात नित्य प्रति आरती की जाती है जिसे संध्या आरती अथवा सांझी आरती कहते हैं। वल्लभ संप्रदाय के मंदिरों में सांझी का कलात्मक रूप देखने को मिलता है जो यहां दीवाल या भीत पर नहीं बल्कि मंदिर चौक में धरातल पर बनाई जाती है। जिसमें विशेष रूप से नाथद्वारा के श्रीनाथजी की हवेली में केले के पत्तों से विविध चित्रित लीलाओं का चित्रण जिसमें ब्रज के वन उपवन, बाग, मोर, बंदर, कुंड, सरोवर तथा राधा कृष्ण की सरल लीलाओं की झांकियों द्वारा भक्ति भाव की रस धारा प्रवाहित की जाती है। अंतिम दिवस अमावस्या के अवसर पर रंग बिरंगी पन्नियों द्वारा कोट का चित्रण किया जाता है जो द्वारका नगरी का प्रतिरूप होता है, और इस तरह ब्रज लीलाओं या ब्रज की परिक्रमा का भाव पूर्ण होता है।”


